कृषि शिक्षा अब केवल वातानुकूलित कमरों और भारी-भरकम किताबों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि इसकी असली परीक्षा अब खेतों की मेड़ और कीचड़ के बीच होगी। बिहार कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू) के कुलपति डॉ. डी. आर. सिंह ने इसी संकल्प को धरातल पर उतारते हुए आज एक अभूतपूर्व मिसाल पेश की। दिनांक 17 जुलाई 2026 को कुलपति महोदय ने स्वयं विश्वविद्यालय के प्रक्षेत्र में उतरकर छात्रों और वैज्ञानिकों के साथ धान-रोपनी कार्यक्रम में हिस्सा लिया। हाथ में धान की पौध और पैरों में मिट्टी लपेटे कुलपति का यह रूप देखकर छात्र न केवल अचंभित थे, बल्कि बेहद उत्साहित भी नजर आए।
कुलपति डॉ. डी. आर. सिंह ने इस दौरान पारंपरिक शिक्षा पद्धति को एक नया आयाम दिया। उन्होंने रोपाई के बीच ही छात्रों का 'फील्ड टेस्ट' लेना शुरू कर दिया। उन्होंने स्नातक, एम.एस.सी. और पी.एच.डी. के छात्र-छात्राओं से तकनीकी प्रश्न पूछे, जैसे—धान की रोपाई के दौरान पौधों के बीच कितनी दूरी होनी चाहिए, बिचड़ा कितने दिनों का होना चाहिए और एक स्थान पर कितनी पौध लगानी चाहिए। छात्रों द्वारा दिए गए संतोषप्रद और सटीक उत्तरों ने कुलपति को आश्वस्त किया कि विश्वविद्यालय की नई पौध सही दिशा में आगे बढ़ रही है।
छात्रों के साथ संवाद के दौरान कुलपति ने गंभीर लहजे में कहा कि 'धान' केवल एक फसल नहीं, बल्कि बिहार और पूरे भारतवर्ष की आजीविका की जीवनरेखा है। उन्होंने जोर देकर कहा कि कृषि शिक्षा का वास्तविक अर्थ केवल डिग्री हासिल करना नहीं, बल्कि मिट्टी की नब्ज को समझना है। डॉ. सिंह ने 'करके सीखो' (Learning by Doing) के सिद्धांत पर बल देते हुए वैज्ञानिकों को कड़े निर्देश दिए कि भविष्य में हर फसल की खेती के समय ऐसे व्यावहारिक कार्यक्रमों का अनिवार्य रूप से आयोजन किया जाए ताकि छात्र केवल किताबी वैज्ञानिक न बनकर जमीन से जुड़े विशेषज्ञ बनें।
इस विशेष अवसर पर विश्वविद्यालय के कई गणमान्य अधिकारी उपस्थित रहे, जिनमें निदेशक (बीज एवं प्रक्षेत्र) डॉ. फिजा अहमद, सस्य विज्ञान विभाग के अध्यक्ष डॉ. संजय कुमार, निदेशक प्रशासन डॉ. राजेश कुमार और प्रक्षेत्र प्रभारी डॉ. शम्भु प्रसाद शामिल थे। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि कुलपति की इस पहल से न केवल छात्रों का मनोबल बढ़ेगा, बल्कि बिहार में कृषि अनुसंधान की गुणवत्ता में भी व्यापक सुधार देखने को मिलेगा।
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